रंजना चिले की कविताएँ
शब्दों में पिरोई भावनाएँ — प्रकृति, भक्ति, नारी-शक्ति और जीवन के अनमोल पल
माँ
माँ तू ममता का सागर है,
तेरे आँचल में जीवन का उजागर है।
थकी राहों में तेरा हाथ,
रात-अँधेरे में तू मेरा साथ।
तेरी लोरी में नींद मिली,
तेरे आशीष से ज़िंदगी खिली।
पावस की पहली बूँद
धरती ने आँचल फैलाया,
बादल ने नेह बरसाया।
पहली बूँद जब पड़ी धरा पर,
मिट्टी की खुशबू छाई घर-घर।
सावन के झूले संग झूमे,
मन की दुनिया नई सी घूमे।
नारी-शक्ति
वो आग है, वो पानी भी है,
वो रात है, वो रोशनी भी है।
धरती-सी सहनशील है वो,
पर ज़रूरत पड़े तो दुर्गा है वो।
बंधनों को तोड़ आगे बढ़ती,
नई राहें खुद रोज़ गढ़ती।
भोर की किरण
रात की काली चादर हटी,
भोर की लाली क्षितिज पर छटी।
पंछी उड़े नभ की ओर,
जीवन का नया हुआ शोर।
हर दिन नई उम्मीद लाए,
हर सुबह नई राह दिखाए।
गुरु-वंदना
गुरु वो दीपक जो राह दिखाए,
अँधेरे में रोशनी जो जलाए।
ज्ञान का भंडार खोलते हैं वो,
जीवन की राहें बोलते हैं वो।
उनके चरणों में शीश नवाऊँ,
उनके आशीष से आगे जाऊँ।
मेरा भारत
विविधताओं में एकता है यहाँ,
सबकी अपनी भाषा-बोली है जहाँ।
हिमालय की ऊँचाई से नमन,
सागर की गहराई जैसा मन।
यह धरती माँ है, यह है वंदन,
भारत माता का करो अभिनंदन।
काव्य-संग्रह
भावों की धारा
प्रथम काव्य-संग्रह • ५२ कविताएँ
मन के मोती
द्वितीय काव्य-संग्रह • ६४ कविताएँ
शब्दों की छाँव
तृतीय काव्य-संग्रह • ७१ कविताएँ